मथुरा: श्री बांके बिहारी मंदिर से जुड़ा बड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। मंदिर के परंपरागत सेवाधिकारी (सेवायत) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी “बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश 2025” के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। उन्होंने इस अध्यादेश को मंदिर की धार्मिक परंपराओं और सेवायतों के अधिकारों के खिलाफ बताया है।

क्या है बांके बिहारी ट्रस्ट अध्यादेश 2025?

उत्तर प्रदेश सरकार ने मथुरा के ऐतिहासिक बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन के लिए एक नया ट्रस्ट गठन करने का प्रस्ताव पारित किया है। इस अध्यादेश के तहत मंदिर के संचालन की जिम्मेदारी अब राज्य सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट को दी जाएगी. ट्रस्ट में सरकारी अधिकारी, धार्मिक प्रतिनिधि और विशेषज्ञ शामिल होंगे. दान-पेढ़ी, दर्शन व्यवस्था और सेवा कार्य इस ट्रस्ट के अधीन होंगे.

सेवायतों की आपत्तियाँ क्या हैं?

मंदिर के सेवाधिकारी, जो वर्षों से पूजा-अर्चना और व्यवस्था संभालते आए हैं, ने इस ट्रस्ट मॉडल का कड़ा विरोध किया है। उनकी मुख्य आपत्तियाँ यह अध्यादेश सेवायतों की पारंपरिक भूमिका खत्म कर देगा. धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है. मंदिर का नियंत्रण सरकार को सौंपना, संविधान की भावना के विरुद्ध है.मंदिर सदियों से परिवार परंपरा से संचालित होता आया है, यह व्यवस्था ध्वस्त की जा रही है.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

  • सेवायतों की ओर से एक याचिका दायर की गई है जिसमें अध्यादेश को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई

  • मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 2 हफ्ते में जवाब मांगा है

  • अगली सुनवाई की तारीख जल्द तय की जाएगी

 राज्य सरकार का पक्ष

सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश श्रद्धालुओं की सुविधा, पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है. सेवायतों को सम्मानपूर्वक भूमिका दी जाएगी, लेकिन एक संगठित ढांचा भी ज़रूरी है. मंदिर की लोकप्रियता और आय में वृद्धि के कारण पारंपरिक मॉडल में सुधार की आवश्यकता है.

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