लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों स्वामी प्रसाद मौर्य चर्चा के केंद्र बने हुए हैं। भाजपा और सपा छोड़ने के बाद अब अपनी पार्टी बनाकर संघर्ष कर रहे मौर्य लगातार बीजेपी और समाजवादी पार्टी पर तो हमलावर हैं, लेकिन बसपा और मायावती पर उनके तेवर नरम पड़ते दिख रहे हैं। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में उनके ‘घर वापसी’ के कयास लगाए जाने लगे हैं।
बसपा को लेकर नरमी, मायावती की तारीफ़
ग़ाज़ीपुर में जनसभा के दौरान मौर्य ने सपा और भाजपा दोनों पर तीखा हमला बोला और कहा कि दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। उन्होंने सपा सरकार में हुए कब्ज़ों और अत्याचारों का ज़िक्र करते हुए मौजूदा भाजपा सरकार पर भी यही आरोप दोहराए।
हालाँकि, बसपा पर उन्होंने कोई हमला नहीं किया। उल्टा उन्होंने मायावती की तारीफ़ करते हुए उन्हें अब तक की सबसे बेहतर मुख्यमंत्री बताया और संकेत दिया कि अगर मायावती बाबासाहेब आंबेडकर और कांशीराम के मिशन पर लौटेंगी, तो उन्हें हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं होगा।
क्यों बढ़ी मौर्य की बेचैनी?
-
सपा में विकल्प की तलाश: समाजवादी पार्टी अब मौर्य के बजाय बाबू सिंह कुशवाहा पर दांव लगाती दिख रही है। हाल ही में ऊँचाहार में कुशवाहा की बड़ी रैली ने मौर्य समाज को दो हिस्सों में बाँट दिया।
-
लगातार दलबदल: 2017 में बसपा छोड़कर भाजपा और फिर 2022 में भाजपा छोड़कर सपा से जुड़े मौर्य 2023 में सपा से भी अलग हो गए।
-
सियासी पकड़ ढीली: लगातार हार और दलबदल के चलते मौर्य का कद ओबीसी राजनीति में पहले जैसा मज़बूत नहीं रहा।
बसपा में वापसी ही एकमात्र विकल्प?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में मौर्य के पास बसपा ही एक ठिकाना बचा है। बसपा छोड़ते समय उन्होंने मायावती पर गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन मौजूदा हालात और कमज़ोर होती सियासी पकड़ को देखते हुए उनकी बसपा में वापसी ही उन्हें नया सहारा दे सकती है।
