सत्संग: प्रसिद्ध संत बाबा उमाकान्त जी महाराज ने अपने सत्संग में कहा कि जीवन में पढ़ाई-लिखाई की अहमियत केवल नौकरी पाने या नाम कमाने तक सीमित नहीं है। जब किसी ने गुरु से पढ़ाई में सफलता की दया मांगी हो, तो वही दया संगत और सेवा कार्य में भी उपयोग हो सकती है। उन्होंने कहा कि अगर आप बुद्धि का उपयोग सत्संग, सेवा और संगत में करते हैं, तो उसमें भी गुरु की कृपा अवश्य बरसेगी। इसलिए हर किसी को संगत के कार्य में मन लगाना चाहिए।
घाट की साधना का महत्व:
बाबा जी ने “घाट की साधना” का अर्थ स्पष्ट करते हुए बताया कि जब तक साधक घाट (ध्यान स्थल) पर जाकर सच्चे मन से आत्मा की पुकार नहीं लगाएगा, तब तक मुक्ति की नाव नहीं आएगी। जैसे नदी पार करने के लिए मल्लाह को बुलाना पड़ता है, वैसे ही आत्मा को भवसागर से पार कराने के लिए गुरु को पुकारना ज़रूरी है। दुनिया की आपाधापी, झगड़े, दुख-सुख, जन्म-मरण का चक्र — यही भवसागर है। इससे पार पाने का रास्ता है – रोज घाट पर बैठना, रोज साधना करना और गुरु को सच्चे मन से पुकारना। तभी गुरु आपकी नैया पार लगाएंगे। अगर पुकार नहीं होगी तो यह शरीर (जो किराए का मकान है) एक दिन खाली कराना ही पड़ेगा।
नामदानियों के लिए मार्गदर्शन:
महाराज जी ने नामदान लेने वालों को संगठित होकर काम करने की प्रेरणा दी। उन्होंने सुझाव दिया कि पाँच-पाँच लोगों की टोलियाँ बनाओ – एक संगठनकर्ता, एक खर्च वहन करने वाला और अन्य साधक। अगर सेवा का भाव और हिम्मत होगी तो गुरु महाराज की दया से हर ज़रूरी संसाधन और सहयोग अपने आप मिलने लगेगा। जो लोग साधना में मन लगाएँगे, वे खुद सेवा के लिए आगे आएंगे और कहेंगे – “हमें बताइए, हम अपने तन-मन-धन से क्या सेवा कर सकते हैं?” क्योंकि जब किसी को यह ज्ञान हो जाता है कि यह जीवन केवल कुछ क्षणों का है, यह शरीर, धन-दौलत, मकान, परिवार — सब एक भ्रम है, तब वो सच्चे अर्थों में सेवा के लिए समर्पित हो जाता है।
महाराज जी ने कहा कि आज से ही इस सच्चाई को खुद भी समझो और दूसरों को भी समझाना शुरू कर दो। अगर खुद नहीं समझ पा रहे हो, तो जो लोग समझ गए हैं, उनसे पूछ लो। समझना और समझाना – दोनों की जिम्मेदारी बनती है।
