Lucknow: उत्तर प्रदेश की बिजली कंपनियों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, अधीनस्थ कार्यालयों और स्थानीय निकायों पर कुल 15,569 करोड़ रुपये का बिजली बिल बकाया है। ये आंकड़े 31 मार्च 2025 तक के हैं और सरकार की लापरवाही ने प्रदेश की ऊर्जा व्यवस्था को गंभीर संकट की ओर धकेल दिया है।
बिजली कंपनियां भारी घाटे में:-
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की सभी बिजली वितरण कंपनियां लगभग एक लाख करोड़ रुपये के आर्थिक घाटे से जूझ रही हैं, वहीं आम उपभोक्ताओं पर करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि दर्ज है। जानकारों का मानना है कि यदि केवल सरकारी विभाग अपने लंबित भुगतान समय पर कर दें, तो बिजली कंपनियों की वित्तीय हालत में बड़ा सुधार हो सकता है।
दक्षिणांचल और पूर्वांचल सबसे बड़े बकायेदार
| बिजली कंपनी | कुल सरकारी बकाया |
| दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम | 5398 करोड़ |
| पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम | 3193 करोड़ |
| मध्यांचल विद्युत वितरण निगम | 3895 करोड़ |
| पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम | 1832 करोड़ |
| केस्को विद्युत वितरण निगम कानपुर | 1250 करोड़ |
निजीकरण के कारण बढ़ी समस्या:-
प्रदेश सरकार द्वारा पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन दोनों कंपनियों का ही कुल बकाया 8591 करोड़ रुपये है। पिछले छह महीनों में 4500 करोड़ रुपये का नया बकाया जुड़ा है, क्योंकि निजीकरण की सुगबुगाहट के बाद कई सरकारी विभागों ने बिल देना ही बंद कर दिया।
क्या कहती है उपभोक्ता परिषद?
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने साफ शब्दों में कहा कि, “अगर सरकार सिर्फ सरकारी विभागों का बकाया बिजली कंपनियों को दे दे, तो उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सकती है। लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिजली कंपनियों में बैठे शीर्ष अधिकारी खुद ही सरकार के अधीन हैं, और वे अपने ही विभागों से बकाया नहीं वसूल पा रहे हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि जब सभी कंपनियों के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक आईएएस अधिकारी हैं और फिर भी सरकारी बकाया नहीं वसूल पा रहे, तो उनकी प्रशासनिक दक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
