लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आज पूरी तरह नीले रंग में रंगी नजर आई। मौका था बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि का। इस अवसर पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांशीराम स्मारक स्थल पर पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। इसके बाद वे अपने भतीजे आकाश आनंद के साथ मंच पर पहुंचीं और हजारों की संख्या में जुटे समर्थकों का अभिवादन किया। यह रैली करीब नौ साल बाद लखनऊ में मायावती का बड़ा शक्ति प्रदर्शन मानी जा रही है। इस आयोजन में उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश से भी समर्थक पहुंचे। भीड़ में महिलाओं और युवाओं की संख्या भी उल्लेखनीय रही।
दो मंच, सात चेहरे और लाखों समर्थक
कांशीराम स्मारक स्थल पर दो अलग-अलग मंच तैयार किए गए। एक मंच पर मायावती के साथ उनकी “सोशल इंजीनियरिंग” रणनीति को दर्शाने वाले सात प्रमुख चेहरे मौजूद रहे। दूसरा मंच प्रदेश के मंडल कोऑर्डिनेटर्स के लिए बनाया गया था। वहीं, रमाबाई अंबेडकर मैदान में बसपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के ठहरने की व्यवस्था की गई। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, रैली में करीब पांच लाख लोगों की भीड़ उमड़ी। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनज़र दो हजार से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए और शहर में ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया गया।
सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, सियासी शक्ति प्रदर्शन भी
हालांकि बसपा ने इस आयोजन को कांशीराम को श्रद्धांजलि बताकर प्रचारित किया, लेकिन राजनीतिक जानकार इसे “सियासी महा-आगाज” मान रहे हैं। रैली के मंच से मायावती ने भाजपा सरकार की कुछ योजनाओं की सराहना की और कहा कि “योगी सरकार ने हमारी योजनाओं का पैसा नहीं दबाया, जबकि सपा सरकार में बहुजन समाज के लिए भेजे गए फंड रोक दिए जाते थे।” इस बयान के बाद प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई। सपा ने मायावती पर भाजपा के साथ “छिपा गठजोड़” करने का आरोप लगाया, वहीं भाजपा नेताओं ने कहा कि मायावती का बयान सरकार के कामकाज की निष्पक्ष स्वीकारोक्ति है।
2027 के लिए ‘ब्लू प्रिंट’?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह रैली 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा है। लंबे समय से शांत रहीं मायावती ने इस मंच से स्पष्ट संदेश दिया कि बसपा अब फिर से सड़कों पर उतरने और वोट बैंक दोबारा मजबूत करने के मूड में है।
