लखनऊ: रोहंगिया शरणार्थियों के पुलिस डिटेंशन से ग़ायब हो जाने पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी निम्नस्तरीय और संविधान की भावना के ख़िलाफ़ है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि ख़राब हुई है. इस टिप्पणी से रोहंगिया शरणार्थियों के ख़िलाफ़ हिंसा को बढ़ावा मिलेगा. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सीजेआई की तरफ़ से यह टिप्पणी आरएसएस-भाजपा के नैरेटिव को सूट करने के लिए किया गया हो. यह बातें कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने साप्ताहिक स्पीक अप कार्यक्रम की 224 वीं कड़ी में कहीं.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि पुलिस डिटेंशन से ग़ायब होने पर दायर हैबियस कॉर्पस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का उन्हें घुसपैठिया कहते हुए उनकी आश्रय, भोजन और शिक्षा की जरूरतों के मुद्दे को यह कहकर ख़ारिज करना कि भारत अपनी ग़रीबी से जूझ रहा है इसलिए इन्हें नहीं दे सकता संविधान के अनुच्छेद 21 के ख़िलाफ़ है. जो भारत में रहने वाले नागरिकों और गैरनागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन जीने का समान अधिकार देता है.

उन्होंने कहा कि जिस समुदाय को संयुक्त राष्ट्र बहुसंख्यकवादी सैन्य सरकार द्वारा नस्लीय सफ़ाए और जनसंहार से दुनिया के सबसे पीड़ित वर्ग बता चुका है उसके प्रति भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन्हें घुसपैठिया कहना निम्नस्तरीय तो है ही यह आरएसएस और भाजपा से जुड़े गुंडा तत्वों को उनके ख़िलाफ़ हिंसा करने को प्रोत्साहित करेगा. इसलिए इस टिप्पणी को न्यायिक के बजाए राजनीतिक टिप्पणी माना जाना चाहिए.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि सीजेआई को यह ध्यान में रखना चाहिए था कि भारत तिब्बती, अफ़ग़ानी और श्रीलंकाई शरणार्थियों को पनाह देता रहा है. जो शरणार्थियों की समस्या पर अंतरराष्ट्रीय संधियों में भारत के हस्ताक्षरकर्ता होने के आधार पर किया जाता रहा है. उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत भी किसी भी शरणार्थी को उसकी सहमति के बिना उसके मूल देश में नहीं भेजा जा सकता जहाँ उसे जान का ख़तरा हो. इसलिए मुख्य न्यायाधीश को अपनी संविधान विरोधी टिप्पणी को वापस लेकर भारतीय न्यायपालिका की नैतिक प्रभुत्व को पुनर्बहाल करना चाहिए.

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