तेहरान। ईरान इस समय हाल के वर्षों के सबसे भीषण जन-आंदोलन की चपेट में है। देशभर में भड़के विरोध-प्रदर्शन अब उग्र रूप ले चुके हैं। राजधानी तेहरान सहित कई बड़े शहरों में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया है, सरकारी संपत्तियों में आगजनी की जा रही है और हालात लगातार बेकाबू होते जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों का सीधा निशाना सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाला इस्लामिक शासन है। सड़कों पर “आजादी-आजादी” और “खामेनेई मुर्दाबाद” जैसे नारे गूंज रहे हैं।

क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की अपील के बाद भड़का आंदोलन

ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस रेजा पहलवी की अपील के बाद हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। बताया जा रहा है कि यह आंदोलन अब केवल आर्थिक या सामाजिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन की मांग में बदल चुका है। प्रदर्शनकारी जगह-जगह बैरिकेड्स तोड़ रहे हैं और सुरक्षा बलों के साथ हिंसक झड़पें हो रही हैं।

तेहरान के अस्पतालों में 217 मौतें, हालात भयावह

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, केवल तेहरान के छह अस्पतालों में ही मृतकों की संख्या 217 तक पहुंच चुकी है। इनमें से अधिकतर की मौत गोली लगने या अत्यधिक बल प्रयोग के कारण हुई बताई जा रही है। देशभर में घायलों की संख्या हजारों में होने की आशंका है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई इलाकों में एम्बुलेंस और आपात सेवाएं भी समय पर नहीं पहुंच पा रही हैं।

पूरे ईरान में फैला विरोध, इंटरनेट पर पाबंदी

ईरान के लगभग सभी प्रमुख शहरों—तेहरान, मशहद, इस्फहान, शिराज और तबरीज—में व्यापक प्रदर्शन हो रहे हैं। हालात पर काबू पाने के लिए सरकार ने कई इलाकों में इंटरनेट और संचार सेवाओं पर रोक लगा दी है, ताकि सूचनाओं का प्रसार रोका जा सके।

सत्ता से ज्यादा जान बचाने की चिंता?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह आंदोलन खामेनेई शासन के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। ईरान में यह चर्चा आम है कि सुप्रीम लीडर अब सत्ता बचाने से ज्यादा अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और राजधानी में हाई अलर्ट घोषित किया गया है।

क्या बदलेगा ईरान का भविष्य?

ईरान में जारी यह आंदोलन न केवल देश की आंतरिक राजनीति को हिला रहा है, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व की स्थिरता पर भी असर डाल सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार बल प्रयोग से हालात काबू में लाती है या यह आंदोलन किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर बढ़ता है।

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