धर्म कर्म: प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत उमाकांत जी महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि सुमिरन, ध्यान और भजन जैसी साधनाएं न केवल आत्मिक शांति देती हैं, बल्कि जीव के संचित कर्मों को भी नष्ट करने में समर्थ हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को आह्वान किया कि वे इन आध्यात्मिक मार्गों को अपनाकर जीवन को सार्थक बनाएं।
कर्मों का नाश केवल सच्चे सुमिरन से संभव
संत उमाकांत जी महाराज ने कहा, “जब तक मनुष्य सतनाम और सच्चे गुरु के बताए मार्ग पर नहीं चलता, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। जो सुमिरन, ध्यान और भजन को सीखकर प्रतिदिन करता है, उसके पुराने पाप कर्म भी जल जाते हैं।” उन्होंने समझाया कि जैसे अग्नि सूखे लकड़े को भस्म कर देती है, वैसे ही आत्मसाधना के अभ्यास से मनुष्य के सभी बुरे कर्म समाप्त हो सकते हैं
भक्ति से मिलता है सच्चा सुख
महाराज जी ने यह भी कहा कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं, लेकिन भक्ति में जो आनंद है, वह शाश्वत है। सच्चे भक्त को ना किसी भौतिक वस्तु की इच्छा रहती है, ना ही उसे संसार के दुख व्यथित करते हैं।
