सत्संग: प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत उमाकांत जी महाराज ने अपने प्रवचन में बताया कि सुमिरन, ध्यान और भजन जैसी साधनाएं न केवल आत्मिक शांति देती हैं, बल्कि जीव के संचित कर्मों को भी नष्ट करने में समर्थ हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को आह्वान किया कि वे इन आध्यात्मिक मार्गों को अपनाकर जीवन को सार्थक बनाएं। इस समय दो से पांच घंटे का साधना शिविर बाबा उमाकांत जी महाराज के मार्गदर्शन में आयोजित हो रहा है, जिसमें सतगुरु की पूजा, ध्यान, भजन, और प्रवचन शामिल हैं।

उमाकांत जी महाराज का कहना है दिन में दो घंटा कम से कम बैठो। देखो डेढ़ घंटा, एक घंटा तक तो यह मन बराबर भगता रहता है, उसके बाद यह धीरे-धीरे रुकने लगता है; जहां पर दृष्टि को जमाओगे या जो आवाज पकड़ने की कोशिश करोगे, वहां पर फिर यह फिर रुकने लगेगा, घाट पर फिर यह आने लग जाएगा और नहीं तो यह इधर-उधर भागता रहेगा। तो 2 घंटा बैठे और फिर उठ कर चले गए। फिर आए दो घंटा बैठ गए, ढाई घंटा बैठ गए। फिर चले जाओ और मन लग जाए आपका, तो दो घंटा में आने के बजाय डेढ़ घंटा में चले आओ। आपको मान लो कोई तकलीफ महसूस होने लगे तो वहीं पर गए अपना पानी-पेशाब किया घूमते रहे, आए फिर बैठ गए। जितना ही बैठोगे, जितना ही मन को रोकने की कोशिश करोगे उतना ही जल्दी आपको सफलता मिल जाएगी, कामयाबी मिल जाएगी।

2 से 5 घंटे की अखंड साधना शिविर रोज लगाओ

इंदौर को पूरे चार भागों में बांट दो और जहां भी जगह मिल जाए आपको, वहां एक जगह पर, दो जगह कर, तीन जगह पर जहां जैसे चाहो, वहां पर 5 घंटे की साधना शिविर लगवाओ। रोज लगवाओ। रोज लगनी चाहिए। जैसे सुबह 4 बजे शुरू कर दिया और मान लो, मौहल्ला बड़ा है, कॉलोनी बड़ी है तो जिसके नजदीक हो, वही लोग पहले पहुंच जाएं और एक प्रार्थना बोल दें। प्रार्थना बोलने के बाद तीन बार, पांच बार जयगुरुदेव नाम की नामध्वनि बोल दिया। उसके बाद बैठ गए। घड़ी देख लिया, जब शुरू करो तो उसके पांच घंटे बाद खत्म कर दो। तो 9 बजे से पहले-पहले खत्म हो जाएगा। फिर अपने काम पर चले जाओ। 10 बजे से पहले पहुंच जाओ। दुकान खोल दो, चाहे आप नौकरी कर लो दस बजे से। तो रोज हो सकता है। कोई बड़ी चीज नहीं है। 5 घंटा कोई नहीं बैठ सकता है तो सुबह आ गए, शुरूआत कर दिए, दो घंटा, ढाई घंटा बैठे तब तक दूसरे लोग आ गए। जो घर से पूरी तैयारी करके आए कि वहीं से हम सीधा दफ्तर चले जाएंगे। टिफिन ले करके आए हैं, वहीं नाश्ता करेंगे, वहीं रोटी खाएंगे तो उसको अपना खा-पी करके चले गए या टिफिन अपना लेकर के वहीं से चले गए। जो लोग सुबह 4 बजे बैठ गए, वो अपना दो-ढाई घंटे बैठे, जब तक समय रहा फिर अपने-अपने घर गए, नाश्ता किया, खाना खाया, चले गए। कोई व्यवस्था वहां नहीं करनी पड़ेगी और व्यवस्था करनी भी नहीं है। व्यवस्था में बहुत झंझट होती है, बड़ी दिक्कत होती है। व्यवस्था में और भी लोगों के कर्म आते हैं। मान लो कोई बुरा कर्म वाला है और उसने बनाकर के आपको खिला दिया और आपने खा लिया। फ्री में आपको मिल गया। आपने कुछ खर्च नहीं किया। तो या तो साधना में से आपको देना पड़ेगा, जो मेहनत करोगे और या तो उनका कर्म-कर्जा लदेगा। इस जन्म में अदा करना पड़ेगा, मर जाओगे तो फिर जन्म लोगे, दूसरे जन्म में अदा करना पड़ेगा। इस चीज को खुद ठीक से समझ लो सब लोग। और ये देखो ये बच्चियां समझ पाती हैं। जो कम पढ़ें-लिखे लोग हैं या हिन्दी जो मैं बोलता हूं, ठीक से नहीं समझ पाते हैं, जो आपकी यहां की मालवा की भाषा बोलते हैं, इंदौर की ही भाषा बोलते हैं; हिंदी नहीं समझ पाते हैं, उनके समझ में ये सारी बातें नहीं आती हैं। लेकिन जो स्त्री-पुरुष आप समझ जाते हो, एक-दूसरे को समझा दो, इन बातों को समझा दो। कोशिश यही रहे कि दूसरे का न खाओ, दूसरे से सेवा न लो, दूसरे के ऊपर निर्भर न रहो। अपने ऊपर निर्भर रहो, अपने मेहनत की कमाई खाओ, अपनी मेहनत का खर्च करो। कोशिश यही रहे कि जिसके पास नहीं है, उसको आप दे दो। जो भूखा है, उसको अपनी रोटी में से रोटी खिला दो, आपका खर्चा जो है, उसमें से बच जाता है तो उसका इलाज करा दो; तो उसका फायदा मिल जाएगा आपको। बैठते भी हो, करते भी हो लेकिन ऐसे ही गवा देते हो। रह कुछ नहीं जाता है।

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