पटना: दिवाली के बाद बिहार की सियासत में बड़ी हलचल देखने को मिल सकती है। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 25 अक्टूबर से ‘मिशन बिहार’ पर निकल रहे हैं। माना जा रहा है कि यह दौरा ना सिर्फ बिहार में महागठबंधन को ऊर्जा देगा, बल्कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए विपक्षी एकता की नई पटकथा भी तैयार करेगा।
सपा-राजद गठबंधन: विपक्षी एकता की नई बुनियाद:-
बिहार में राजद (RJD) के नेता तेजस्वी यादव पहले से ही भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। अब जब अखिलेश यादव खुद मैदान में उतरने जा रहे हैं, तो इसे विपक्षी दलों की एकता को मजबूती देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, अखिलेश यादव कई जिलों में रैलियां करेंगे, सभाएं करेंगे और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज को एकजुट करने का प्रयास करेंगे। यह रणनीति उत्तर प्रदेश में कारगर साबित हुई है और अब सपा इसे बिहार में भी दोहराना चाहती है।
2025 में बिहार चुनाव: भाजपा के लिए बढ़ेगी चुनौती:-
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले विपक्षी दलों के बीच सीटों का तालमेल और जमीनी स्तर पर तैयारियां बेहद अहम होंगी। सपा के इस सक्रिय हस्तक्षेप से जहां राजद को मजबूती मिलेगी, वहीं भाजपा के लिए यह नया सिरदर्द बन सकता है।
बिहार में पहले ही जातीय गणित, महंगाई, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरा जा रहा है। अब अखिलेश यादव का आक्रामक प्रचार इस आग में घी डालने का काम करेगा।
सपा की बिहार में रणनीति क्या है?
समाजवादी पार्टी बिहार में फिलहाल सीमित राजनीतिक उपस्थिति रखती है, लेकिन सपा का मानना है कि बिहार के सीमावर्ती जिलों में, खासकर पूर्वी बिहार और कोसी-सीमांचल क्षेत्र में उसकी विचारधारा को समर्थन मिल सकता है। साथ ही, यह दौरा 2024 के लोकसभा चुनावों में INDIA गठबंधन की एकजुटता को आगे बढ़ाने का संकेत भी देता है।
PDA कार्ड: भाजपा के खिलाफ सीधा हमला:-
अखिलेश यादव अपने हर भाषण में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वर्ग को जोड़ने की बात करते हैं। उनका दावा है कि भाजपा सरकार सिर्फ कुछ खास वर्गों को लाभ पहुंचा रही है और सामाजिक न्याय के मुद्दे को दरकिनार कर रही है। बिहार में भी यह कार्ड खेलकर सपा, राजद और अन्य गठबंधन दल भाजपा को सीधी चुनौती देने की तैयारी में हैं।
अखिलेश यादव का बिहार दौरा केवल एक चुनावी रैली नहीं, बल्कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता का प्रतीक बनता जा रहा है। सपा और राजद के बीच नज़दीकी बढ़ना एक नई राजनीतिक धुरी के रूप में देखा जा सकता है।
आगामी हफ्तों में बिहार की राजनीति में कई मोड़ आ सकते हैं, और सपा की यह पहल भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश साबित हो सकती है।
