लखनऊ। शहर की हृदयस्थली वीवीआईपी हजरतगंज का वह गौरवशाली थाना जो सीधे मुख्यमंत्री की नज़रों की निगरानी में रहता है, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह पुलिस विभाग नहीं बल्कि निजी जागीर है। यहाँ के राजसी सेवक यानी हमारे वर्दीधारी जनता के साथ पेश आते हैं, मानो वे शपथ ग्रहण नहीं बल्कि किसी गुंडागर्दी का पट्टा लेकर आए हों।

ताज़ा वीरगाथा विकास चौरसिया जी की है। उनका अपराध बस इतना था कि वह एक आम नागरिक हैं। आरोप है कि दो महानुभाव पुलिसकर्मियों ने सड़क पर ही उनका राज्याभिषेक डंडों से किया, और फिर इंसाफ के सबूत यानी उनका मोबाइल तोड़कर अपनी सेवा-भावना का परिचय दिया।

लेकिन पुलिस की आधुनिक कार्यशैली का असली नज़ारा थाने के भीतर दिखा। जब विकास शिकायत लेकर पहुँचे तो उन्हें अतिथि कक्ष नहीं बल्कि यातना कक्ष वह कैमरा-मुक्त कमरा! मिला जहाँ उन्हें न्यायिक परामर्श के तौर पर पीटा गया। यह है हमारी पुलिस का नया ट्रांसपेरेंसी मॉडल, मारो-पीटो पर रिकॉर्ड मत होने दो!

और उस वायरल वीडियो का क्या कहना, जिसमें थानाधीश महोदय भी पीड़ित को शाही फटकार लगाकर थाने से पलायन कराते दिख रहे हैं! शायद वे जनता की सेवा को असुविधा मानते हैं।

एक तरफ माननीय मुख्यमंत्री जी पुलिस को डायरेक्ट निर्णय लेने की ताकत दे रहे हैं ताकि वे अपराध पर वज्रपात कर सकें। दूसरी ओर यह हजरतगंज पुलिस, जो इन दिव्य शक्तियों का इस्तेमाल बेचारे नागरिकों पर जुल्म ढाने के लिए कर रही है।

31 अगस्त की उस कलंकित घटना को भूलना मुश्किल है, हजरतगंज Si राहुल द्वारा दबंगों के साथ मिलकर एक निर्दोष पर षड्यंत्रकारी फर्जी मुकदमा लाद देना, जबकि वह व्यक्ति मौके पर था ही नहीं। यह तो पुलिस की नई व्यवसायिक रणनीति है, पहले फर्जी मुकदमा नाम का जाल फेंको, फिर वसूली नाम का हुक डालकर पीड़ित को खींचो।

पुलिस महानिदेशक साहब और कमिश्नर साहब लगातार आदेश दे रहे हैं, जनता को परेशान न करें! पर हजरतगंज के ये वर्दी के रखवाले अपने रोब और रुतबे से बाज नहीं आते। वे तो ऐसे पेश आते हैं, मानो इस थाने की मालिकाना हक़ उन्हीं के पास है और जनता यहाँ किरायेदार है।

जिस तरीके से विकास चौरसिया जी को थाने के अंदर चार दीवारी में पीटा गया, वह पुलिस के चरित्र पर गहरा ज़ख्म है। यह घटना दर्शाती है कि पुलिस ने सेवा और सुरक्षा का रास्ता छोड़कर, दमन और वसूली’ का सीधा मार्ग चुन लिया है।

आधुनिक पुलिस, आपको अपराधी रोकने की ताकत मिली थी, लेकिन आपने तो शिकायतकर्ता को ही अपराधी बना दिया। यह व्यवस्था नहीं यह तो अराजकता का नया अध्याय है, जिस पर वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत पूर्ण विराम लगाना होगा।

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