सीतापुर: विश्व विख्यात परम संत बाबा जय गुरुदेव महाराज जी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी पूज्य संत बाबा उमकांत जी महाराज ने कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर सीतापुर के टेड़वा चिलौला में आयोजित दो दिवसीय सत्संग व नामदान कार्यक्रम में सैकड़ों संख्या में पंहुचे अनुयायियों को सत्संग व नामदान का रसपान कराने के बाद उन्होंने कहा अपने स्वार्थ के लिए कभी गुरु के बताए मार्ग से विरत नहीं होना चाहिए। महाराज ने कहा है कि आत्मकल्याण की राह केवल किताबों या ग्रंथों के अध्ययन से पूरी नहीं होती। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति सद्गुरु के सान्निध्य में रहकर मार्गदर्शन प्राप्त करे। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान तभी फलदायी होता है जब उसे गुरु के बताए अनुसार जीवन में उतारा जाए।

गुरु का मार्गदर्शन ही सच्चा प्रकाश

उमाकांत जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा “जैसे डॉक्टर की किताब पढ़ लेने से कोई चिकित्सक नहीं बन जाता, वैसे ही शास्त्र पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं बनता। गुरु वह दीपक हैं जो अंधकार में मार्ग दिखाते हैं।” उन्होंने कहा कि आज लोग इंटरनेट और पुस्तकों से ज्ञान तो ले रहे हैं, लेकिन आत्मा के अनुभव से दूर हैं। गुरु का आशीर्वाद ही उस ज्ञान को जीवित अनुभव में बदल देता है।

पुस्तकों का महत्व, पर गुरु की आवश्यकता अधिक

महाराज जी ने स्पष्ट किया कि किताबें आत्मज्ञान की ओर पहला कदम हैं, लेकिन गुरु उसका अंतिम द्वार हैं। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में भी लिखा गया है “गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न दोष” — यानी बिना गुरु के न तो सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है और न ही मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं।

साधना और सेवा का संदेश

उमाकांत जी महाराज ने भक्तों को संदेश देते हुए कहा कि जीवन में साधना, सेवा और संयम को स्थान दें। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर ही आत्मकल्याण और परम शांति संभव है। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि वे केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित न रहें, बल्कि आध्यात्मिकता को जीवन का हिस्सा बनाएं।

उमाकांत जी महाराज का यह संदेश आज के भौतिक युग में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ लोग बाहरी ज्ञान के पीछे भाग रहे हैं परंतु आंतरिक अनुभव और गुरु मार्गदर्शन से वंचित हैं। उन्होंने कहा कि “गुरु ही आत्मा का दर्पण हैं”, और उनके बताए मार्ग पर चलकर ही सच्चा आत्मकल्याण संभव है।

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