Power privatisation: उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य की छह लघु जल विद्युत परियोजनाओं को 42 वर्षों के लिए निजी क्षेत्र को लीज पर देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस संबंध में Uttar Pradesh Rajya Vidyut Utpadan Nigam द्वारा टेंडर जारी किया गया है। प्रस्ताव के अनुसार, निजी कंपनियों से प्रति मेगावाट लगभग 1.5 करोड़ रुपये अग्रिम प्रीमियम लिया जाएगा और चयनित कंपनी निर्धारित अवधि तक परियोजनाओं का संचालन करेगी।

किन परियोजनाओं को लीज पर देने का प्रस्ताव

लीज पर प्रस्तावित सभी परियोजनाएं अपर गंगा नहर पर स्थित हैं और लगभग नौ से दस दशक पुरानी मानी जाती हैं। इनमें भोला (2.7 मेगावाट), सलावा (3 मेगावाट), निर्गजनी (5 मेगावाट), चित्तौरा (3 मेगावाट), पलरा (0.6 मेगावाट) और सुमेरा (1.5 मेगावाट) शामिल हैं। इनकी कुल स्थापित क्षमता सीमित है, लेकिन इनके साथ जुड़ी जमीन और परिसंपत्तियों का मूल्य काफी अधिक बताया जा रहा है। प्रदेश में पहले से रिहंद, ओबरा, माताटीला और खारा जैसी बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं संचालित हैं। सरकार का तर्क है कि पुरानी लघु परियोजनाओं के आधुनिकीकरण और बेहतर प्रबंधन के लिए निजी भागीदारी से दक्षता बढ़ेगी और उत्पादन में स्थिरता आएगी।

विरोध में उतरे कर्मचारी संगठन

टेंडर जारी होते ही ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े कर्मचारी संगठनों और अभियंता संघों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि जल विद्युत परियोजनाएं राज्य की संपत्ति हैं और इन्हें निजी हाथों में सौंपना सार्वजनिक हित के खिलाफ हो सकता है।

All India Power Engineers Federation के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया है कि परियोजनाओं की स्थापित क्षमता और परिसंपत्तियों का मूल्यांकन वास्तविकता से कम दिखाया गया है। उनका दावा है कि सीमित निवेश से इन परियोजनाओं का आधुनिकीकरण कर सरकार स्वयं बेहतर राजस्व अर्जित कर सकती है। संगठन ने टेंडर निरस्त होने तक आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दी है। इसी तरह Power Officers Association ने भी इसे निजीकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया है। संगठन के नेताओं का कहना है कि इससे कर्मचारियों की सेवा शर्तों और आरक्षण व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। उनका आरोप है कि निजी कंपनियां अपनी शर्तों पर नियुक्तियां करेंगी और सरकारी नियंत्रण कमजोर होगा।

सरकार की मंशा क्या?

ऊर्जा विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सरकार का उद्देश्य उत्पादन क्षमता में सुधार और पुराने संयंत्रों का तकनीकी उन्नयन है। लघु परियोजनाओं की मशीनरी काफी पुरानी हो चुकी है और इनके रखरखाव पर लगातार खर्च बढ़ रहा है। ऐसे में सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के जरिए इन्हें पुनर्जीवित करने की योजना बनाई गई है। वर्तमान में मामला प्रशासनिक और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। कर्मचारी संगठन मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार निवेश आकर्षित करने और दक्षता बढ़ाने पर जोर दे रही है। टेंडर प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ती है और क्या इसमें कोई संशोधन होता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े इस फैसले का असर न केवल उत्पादन व्यवस्था पर पड़ेगा, बल्कि राज्य की औद्योगिक नीति और कर्मचारी हितों पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

admin

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *