Lucknow: लखनऊ में व्यावसायिक गैस सिलिंडरों की आपूर्ति रुकने से शहर में भोजन व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव स्ट्रीट फूड विक्रेताओं, छोटे रेस्टोरेंटों, ढाबा संचालकों और टिफिन सर्विस चलाने वालों पर पड़ रहा है। इनके पास गैस का सीमित भंडार होता है, इसलिए एक-दो दिन में ही उनके सिलिंडर खत्म होने की स्थिति बन सकती है। अगर जल्द आपूर्ति शुरू नहीं हुई तो करीब पांच लाख से अधिक लोगों के सामने भोजन की समस्या खड़ी हो सकती है।
राजधानी में बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो रोजमर्रा के भोजन के लिए होटल, ढाबों या टिफिन सेवाओं पर निर्भर रहते हैं। इनमें मजदूर, नौकरीपेशा लोग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र और बाहर से पढ़ने आए विद्यार्थी शामिल हैं। गैस की कमी के कारण अगर छोटे भोजनालय बंद होने लगे तो इन लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा।
होटल और रेस्टोरेंट कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि कॉमर्शियल सिलिंडर न मिलने से कारोबार पर भी सीधा असर पड़ेगा। कई छोटे दुकानदारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है, क्योंकि उनका पूरा काम गैस सिलिंडर पर ही निर्भर है। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रावासों में भी इस स्थिति का असर देखने को मिल सकता है। विश्वविद्यालय के विभिन्न छात्रावासों में रहने वाले करीब दो हजार छात्रों के भोजन की व्यवस्था मेस के माध्यम से होती है। फिलहाल मेस में गैस का सीमित भंडार है, जिससे लगभग एक सप्ताह तक ही काम चल सकता है। यदि आपूर्ति जल्द शुरू नहीं हुई तो भोजन व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है।
इसके अलावा गोमतीनगर स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, अटल आवासीय विद्यालय और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसे संस्थानों में रहने वाले करीब 1800 विद्यार्थियों के खाने पर भी असर पड़ सकता है। इन संस्थानों की मेस में रोजाना कई सिलिंडरों की जरूरत होती है, लेकिन हाल के दिनों में पर्याप्त गैस नहीं मिल पा रही है। हालांकि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय और डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में फिलहाल कुछ दिनों तक गैस का भंडार उपलब्ध बताया जा रहा है। इन संस्थानों की कैंटीन और मेस में लगभग 10 से 12 दिनों तक भोजन व्यवस्था बनाए रखने लायक गैस मौजूद है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गैस आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण संकट लंबा खिंचता है, तो राजधानी में छोटे भोजनालयों और छात्रावासों की मेस पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में प्रशासन और गैस कंपनियों के लिए जल्द समाधान निकालना जरूरी होगा, ताकि आम लोगों को खाने-पीने की परेशानी से बचाया जा सके।
